मुंशी प्रेमचंद कि जीवनी, कहानियों, Short Biography और उपन्यास

 

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    1. Introduction

    आज हम इस article मे मुंशी प्रेमचंद कि  जीवनी, कहानियों, Biography और उपन्यासों के बारे मे आसान हिन्दी भाषा मे जानेगे

    2. मुंशी प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन

     मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश हुआ था। दुनिया उन्हें मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानती है। मगर ये उनका असली नाम नहीं था। उनका असली नाम था धनपत राय श्रीवास्तव लिखना शुरू करते समय उन्होंने पहले अपना नाम नवाबराय रखा मगर कुछ समय के बाद उन्हें अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रखना पडा।

    3. मुंशी प्रेमचंद कि Family और जीवन संघर्ष

     सात साल की उम्र में उन्होंने उर्दू और पर्शियन की शिक्षा ग्रहण की। जब वो आठ साल के थे तभी उनकी मां चल बसी। कहते हैं कि यहीं से लिखने पढने में उनकी रूचि बढने लगी क्योंकि उनकी माँ के मरने के कुछ समय बाद ही उनकी दादी का भी देहांत हो गया। उनकी सिर्फ एक ही बडी बहन थी और उन की भी शादी हो चुकी थी और उनके पिता काफी व्यस्त रहते थे। उनके पिता ने कुछ समय के बाद दूसरी शादी कर ली। मगर प्रेमचंद जी को अपनी सौतेली माँ से उतना प्रेम कभी नहीं मिला। ऐसे माहौल में उन्हें एकांत में रह के किताबें पढने की आदत पड गई। उन्होंने पर्शियन,हिंदी, इंग्लिश और उर्दू की कई किताबें पढीं।

    जब वो हाइ स्कूल में थे उस समय वो बहुत बीमार हो गए थे जिसके कारण वो दुसरे डिविजन  से पास हुए पैसों की कमी के कारण उन्हें अपनी पढाई रोकनी पडी।

    4. मुंशी प्रेमचंद का करियर

     उसके बाद उन्होंने बनारस के ही एक वकील के बेटे को पढाने की नौकरी कर ली जिसके लिए उन्हें पांच रूपये मिलते थे। वो दो रुपए में अपना खर्च चलाकर तीन रुपये घर भेज देते थे। इसके बाद एक मिशन री स्कूल के हेडमास्टर ने उन्हें टीचर की नौकरी देने का प्रस्ताव रखा जिसे प्रेमचंद जी ने स्वीकार कर लिया। उस नौकरी से उन्हें महीने के अठारह रुपये मिलते थे। बाद में उन्हें एक सरकारी स्कूल में असिस्टेंट की नौकरी मिल गई।

    5. मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास और आजादि के लिये योगदान

    इसी समय उन्होंने अपना पहला लघु उपन्यास असरारे मावी लिखा जिसे हिंदी में देवस्थान रहस्य कहते हैं। ये लघु उपन्यास बनारस के एक उर्दू साप्ताहिक अकबार् आवाजे खलक में प्रकाशित हुई। उन्नीस सौ पांच [1905] से वो भारत की राजनीति से काफी प्रभावित होने लगे और इसका असर उनकी किताबों में भी दिखने लगा। वो अपनी कहानियों से समाज को आजादी के लिए जागरूक करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने अपने एक लेख में बाल गंगाधर तिलक के प्रयासों की सराहना भी की। उन्होंने एक कहानी “दुनिया का सबसे अनमोल रत्न” लिखी जिसके अनुसार दुनिया का सबसे अनमोल रत्न है हमारे खून की आखिरी बूंद जिससे हमें देश की आजादी के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

     

     वो लोगों को इस कहानी के माध्यम से ये बताना चाह रहे थे कि आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण लक्ष्य कोई और नहीं है और इसके लिए हम सबको एकजुट होकर काम करना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने लघु कहानियों की एक किताब सोजे वतन लिखी जो अंग्रेजों की नजर में आ गई पुलिस ने प्रेमचंद जी के यहां छापा मारा और सोजे वतन के लगभग पांच सौ प्रतियां जला दी इसके बाद उन्हें अपना नाम नवाबराय से बदलकर प्रेमचंद रखना पडा।

    6. मुंशी प्रेमचंद कि बी ए की डिग्री और उपन्यास

    उन्नीस सौ उन्नीस [1919] में प्रेमचंद का लिखा हुआ उपन्यास सेवा सदन लोगों को बहुत पसंद आया और प्रेमचंद भारत में प्रसिद्ध लेखक के रूप में जाने जाने लगे। ये किताब पहले कोलकाता में हिंदी में और लाहौर में उर्दू में प्रकाशित हुई जिसके लिए उन्हें साढे चार सौ [450] और ढाई सौ [250] रुपए  मिले। अपनी शिक्षा पूरी करने की इच्छा उन्हें शुरू से ही थी। उन्नीस सौ उन्नीस [1919] में उनतालीस [39] साल की उम्र में उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बी ए की डिग्री ली।

    7. मुंशी प्रेमचंद ने अपनि सरकारी नौकरि छोड दि

    उन्नीस सौ इक्कीस [1921] में उन्होंने एक मीटिंग में हिस्सा लिया। जहां गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन के लिए लोगों से सरकारी नौकरियाँ छोडने के लिए कहा। प्रेमचंद जी भी इससे बहुत प्रभावित हुए हालांकि उनकी खुद की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इसके बावजूद पांच दिन तक सोच विचार करने के बाद अपनी पत्नी की भी रजामंदी लेकर उन्होंने सरकारी नौकरी से अस्तिफा दे दिया और बनारस चले गए इसके बाद उन्होंने कई सारे उपन्यास और कहानियाँ लिखी।

    8. मुंशी प्रेमचंद कि लिखि फिल्म

     उन्नीस सौ चौंतीस [1934] में वो हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखने की इच्छा से बॉम्बे पहुँचे और अजंता सिनेटोन नामक एक प्रोडक्शन हाउस के लिए एक साल तक स्क्रिप्ट लिखने का ऑफर उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसके लिए उन्हें आठ हजार रुपए एक साल के मिलने थे। उन्हें लगा कि इससे उनकी सारी आर्थिक परेशानियां दूर हो जाएगी। उन्होंने एक फिल्म मजदूर की स्क्रिप्ट लिखी। इस फिल्म में मजदूरों के ऊपर होने वाले अत्याचारों को बहुत करीब से दिखाया गया था। मगर इस फिल्म को बडे बडे उद्योगपतियों ने बॉम्बे में रिलीज होने ही नहीं दिया। लाहौर और दिल्ली में फिल्म रिलीज हुई मगर इसके असर से जब मजदूरों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया तो वहाँ भी फिल्मों पर प्रतिबंध लग गया।

    9. मुंशी प्रेमचंद कि मृत्यु

    प्रेमचंद जी को भी बॉम्बे का अस्थल माहौल अब पसंद नहीं आ रहा था और वहाँ जाने के एक साल के अंदर ही वो बॉम्बे छोडकर इलाहाबाद चले गए जहां उनके बच्चे पढाई कर रहे थे। आठ अक्टूबर उन्नीस सौ छत्तीस [ 8 Oct 1936]  को लंबी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया। वो आम तौर पर सामाजिक परेशानियों के ऊपर वास्तविक परिस्थितियों पर ही कहानियाँ लिखते थे। साहित्य में अपने योगदान के लिए उन्हें उपन्यास सम्राट भी कहा जाता है। लेखक मुंशी प्रेमचंद को बीसवीं सदी का सबसे प्रसिद्ध लेखक कहा जाता है।

    10. मुंशी प्रेमचंद के द्वारा लिखि गयि प्रमुख कहानियां -:

    पूस की रात, कफन, बूढ़ी काकी, तांगेवाले की बड़, पंच परमेश्वर, दो बैलों की कथा, बड़े घर की बेटी और बन्द दरवाजा

    11. मुंशी प्रेमचंद के द्वारा लिखि गयि प्रमुख उपन्यास -:

     गबन, गोदान, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला, रूठी रानी सेवासदन, मानसरोवर और वरदान 

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    12. FAQ:

    Q: मुंशी प्रेमचंद के पिता का नाम क्या था ?

    Ans: अजायब राय (पोस्ट ऑफिस क्लर्क)

    Q: मुंशी प्रेमचंद कि माता का नाम क्या था ?

    Ans: आनंदी देवी 

    Q: मुंशी प्रेमचंद के बेतो के क्या नाम है ?

    Ans: श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव

    Q: मुंशी प्रेमचंद कि पत्नि का क्या नाम था ?

    Ans: शिवरानी देवी

     


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